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Tuesday, 5 May 2015

हिंदुस्तान एक सपना


टुकड़ों मैं बटा-सा यह देश तो देखो, जिसे कोई न बदल पाया वास्तविकता में |

चाहता न था कोई इसे एक बनाना, 

डर गये थे वे इसके प्रभुत्व से,
बन जाता अगर यह देश, कहलाता महाशक्ति इस विशव में |

मज़हब ने तोडा, अंग्रेजों ने बांटा,

समझ न पाया कोई गैरों की चाल | 
गिर गया हिंदुस्तां का ध्वज, बन गया श्वेतों का दास,
चाहते थे वे हमें सभ्य बनाना, जाना न था हमारा इतिहास |
गैर चले गए, फिर अपनों ने लुटा, छोड़ा न जिसे अपनों ने, उसे कैसे छोड़ते वे गैर | 
सोने की मुर्गी थी जो लगी हाथ, यह अपने आज भी लुट रहे, पर न कभी डाले इस देश ने हथियार |
चलती रही समझकर इनको अपना,
पर सब्र का बांध एक दिन तो टूटेगा, माँ लगाएगी अपनों को फटकार, 
मत लो इसका इम्तेहान, यह प्रेम करने वाली माँ है देखो, समर्पित होकर करो इसे नमन, इस माँ ने हैं सहे कई जुर्म |
अगर होते न इसके भाग , न होता मज़हब, धर्म, जात |
टुकड़ों मैं बटा-सा यह देश तो देखो, जिसे कोई न बदल पाया वास्तविकता में |

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