लघु कथा की श्रृंखला में चौथा हिस्सा, “परिहास और ठेला” रोज़ाना की ज़िन्दगी से निकला एक हिस्सा है जिसे हम रोज़ जीते तो हैं, पर शायद ध्यान कम देते हैँ। यह कहानी ठेले पर बाप के साथ काम करते उस बच्चे की है जिसका जीवन ठेले का बंधक है, उसके आस-पास रस तो बहुत हैं, पर जीवन-रस से वह वंचित दिखाई पड़ता है। जीवन के काले पक्ष को दिखाती यह लघु कथा।
मोहाली सेक्टर ७०(sector 70), सत्यनारायण मंदिर की गलियों से गुज़रते, पीoजीo के खाने से तंग, पेट-पूजा करने निकले, मैं और मेरे २ साथी, एक बर्गर और पानी-पूरी के ठेले पर आ कर खोज थमने को आई। चादर से पैर बाहर न पसारते हुए, १५ रूपए( 15 rupees) के टिक्की बर्गर में तृप्ति ढूंढ ली। १५ रूपए में आज मिलता ही क्या है?
तेल में तल्ला बंद और चीज़(cheese) से भरपूर। जेब में पैसे न हों, तो ठेले और मैकडॉनल्ड्स(McDonald’s) के बर्गर में अंतर कर पाना मुश्किल नहीं, नामुमकिन सा लगता है।
बर्गर से हटकर ठेले वाले पर नज़र पड़ी, उसका बेटा बिरले ही ठेले से ऊपर पहुँच रहा होगा पर उसकी यह विवशता उसके काम के आड़े आती न दिखाई पड़ी। तेज़ी से प्लेट साफ करने से लेकर खाना प्लेट में पेश करता वह बालक कुछ भिन्न था। जिज्ञासा उठी तो हम भी पूछ दिए “कहा से हो?” लज्जित-मुस्कान देकर बोला “यूoपीo।” मौका मिल गया अपने यूoपीo वाले मित्र पर तंज कसने का। ऊँगली उसकी ओर की “देखो! ऐसे लोग यूoपीo का नाम बदनाम करते है।” परिहास की चेष्टा सफल रही, बच्चा भी मज़ाक समझ गया। वर्ना, हास्य की कला लुप्त हो ही रही है। दोस्त लाल-पीला हुआ, उसने भी दो-टूक, खरी-खोटी सुनाई। बाप-बेटे ने नोक-झोंक में तनिक भी दिलजस्पी न ली। बड़ी बात नहीं है, पर छोटी भी नहीं। ज़िन्दगी की दौड़ में सब इतने लिप्त हैं, कि दो पल रुक कर कुछ देख भी नहीं पा रहे हैं, उसके रंग और रस का मज़ा भी नसीब न है। चिंतापूर्ण ये नहीं कि ठेले वाला भी इस से वंचित है, बल्कि १२ वर्ष(12 years) के बालक का जीवन भी नीरस-ठेले का बंधक है। उसके ठेले पर रस-मसाले तो बहुत दिखाई पड़ते हैं, पर उनका मज़ा शायद उन्हें ही नसीब नहीं। वह दिखता तो बाप के समान ही है, पर उसकी मासूम-मुस्कान कुछ और ही कहानी बयां करती है।
बर्गर से हटकर ठेले वाले पर नज़र पड़ी, उसका बेटा बिरले ही ठेले से ऊपर पहुँच रहा होगा पर उसकी यह विवशता उसके काम के आड़े आती न दिखाई पड़ी। तेज़ी से प्लेट साफ करने से लेकर खाना प्लेट में पेश करता वह बालक कुछ भिन्न था। जिज्ञासा उठी तो हम भी पूछ दिए “कहा से हो?” लज्जित-मुस्कान देकर बोला “यूoपीo।” मौका मिल गया अपने यूoपीo वाले मित्र पर तंज कसने का। ऊँगली उसकी ओर की “देखो! ऐसे लोग यूoपीo का नाम बदनाम करते है।” परिहास की चेष्टा सफल रही, बच्चा भी मज़ाक समझ गया। वर्ना, हास्य की कला लुप्त हो ही रही है। दोस्त लाल-पीला हुआ, उसने भी दो-टूक, खरी-खोटी सुनाई। बाप-बेटे ने नोक-झोंक में तनिक भी दिलजस्पी न ली। बड़ी बात नहीं है, पर छोटी भी नहीं। ज़िन्दगी की दौड़ में सब इतने लिप्त हैं, कि दो पल रुक कर कुछ देख भी नहीं पा रहे हैं, उसके रंग और रस का मज़ा भी नसीब न है। चिंतापूर्ण ये नहीं कि ठेले वाला भी इस से वंचित है, बल्कि १२ वर्ष(12 years) के बालक का जीवन भी नीरस-ठेले का बंधक है। उसके ठेले पर रस-मसाले तो बहुत दिखाई पड़ते हैं, पर उनका मज़ा शायद उन्हें ही नसीब नहीं। वह दिखता तो बाप के समान ही है, पर उसकी मासूम-मुस्कान कुछ और ही कहानी बयां करती है।





