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Friday, 17 June 2016

लघु कथा: परिहास और ठेला

लघु कथा की श्रृंखला में चौथा हिस्सा, “परिहास और ठेला” रोज़ाना की ज़िन्दगी से निकला एक हिस्सा है जिसे हम रोज़ जीते तो हैं, पर शायद ध्यान कम देते हैँ। यह कहानी ठेले पर बाप के साथ काम करते उस बच्चे की है जिसका जीवन ठेले का बंधक है, उसके आस-पास रस तो बहुत हैं, पर जीवन-रस से वह वंचित दिखाई पड़ता है। जीवन के काले पक्ष को दिखाती यह लघु कथा।

मोहाली सेक्टर ७०(sector 70), सत्यनारायण मंदिर की गलियों से गुज़रते, पीoजीo के खाने से तंग, पेट-पूजा करने निकले, मैं और मेरे २ साथी, एक बर्गर और पानी-पूरी के ठेले पर आ कर खोज थमने को आई। चादर से पैर बाहर न पसारते हुए, १५ रूपए( 15 rupees) के टिक्की बर्गर में तृप्ति ढूंढ ली। १५ रूपए में आज मिलता ही क्या है? 

तेल में तल्ला बंद और चीज़(cheese) से भरपूर। जेब में पैसे न हों, तो ठेले और मैकडॉनल्ड्स(McDonald’s) के बर्गर में अंतर कर पाना मुश्किल नहीं, नामुमकिन सा लगता है।
बर्गर से हटकर ठेले वाले पर नज़र पड़ी, उसका बेटा बिरले ही ठेले से ऊपर पहुँच रहा होगा पर उसकी यह विवशता उसके काम के आड़े आती न दिखाई पड़ी। तेज़ी से प्लेट साफ करने से लेकर खाना प्लेट में पेश करता वह बालक कुछ भिन्न था। जिज्ञासा उठी तो हम भी पूछ दिए “कहा से हो?” लज्जित-मुस्कान देकर बोला “यूoपीo।” मौका मिल गया अपने यूoपीo वाले मित्र पर तंज कसने का। ऊँगली उसकी ओर की “देखो! ऐसे लोग यूoपीo का नाम बदनाम करते है।” परिहास की चेष्टा सफल रही, बच्चा भी मज़ाक समझ गया। वर्ना, हास्य की कला लुप्त हो ही रही है। दोस्त लाल-पीला हुआ, उसने भी दो-टूक, खरी-खोटी सुनाई। बाप-बेटे ने नोक-झोंक में तनिक भी दिलजस्पी न ली। बड़ी बात नहीं है, पर छोटी भी नहीं। ज़िन्दगी की दौड़ में सब इतने लिप्त हैं, कि दो पल रुक कर कुछ देख भी नहीं पा रहे हैं, उसके रंग और रस का मज़ा भी नसीब न है। चिंतापूर्ण ये नहीं कि ठेले वाला भी इस से वंचित है, बल्कि १२ वर्ष(12 years) के बालक का जीवन भी नीरस-ठेले का बंधक है। उसके ठेले पर रस-मसाले तो बहुत दिखाई पड़ते हैं, पर उनका मज़ा शायद उन्हें ही नसीब नहीं। वह दिखता तो बाप के समान ही है, पर उसकी मासूम-मुस्कान कुछ और ही कहानी बयां करती है।

Tuesday, 31 May 2016

लघु कथा : प्रेम और फाटक

लघु कथा की श्रृंखला में तीसरा हिस्सा – प्रेम और फाटक, दो भिन्न धर्म के युवाओं की प्रेम कहानी है।दोनों अपनी मान्यताओं में दृड़ एवं पक्के दिखाई पड़ते हैं, पर प्रेम कैसे एक दूजे के लिए उन मान्यताओं को भूल जाने और एहम को तोड़ने पर मजबूर करता है| सामाजिक दकियानूसी सोच की सीमाओं के बंधन से परे प्रेम की अनंतता को दर्शाती यह लघु कथा|
पालम विहार रेलवे फाटक पर रोज़ उनकी नज़रें मिलतीं। इस सिलसिले को अब २ हफ्ते होने को आ गए।
“सुन! वो लड़की क्या इधर ही देख रही है?” “हाँ भाई” बाइक पर बैठे दोस्त के इस वाक्य ने आग में जैसे घी का काम किया। देर न लगी और उसे लड़की के बस स्टॉप और कॉलेज का भी अंदाज़ा लग गया। 
नैन-मट्टका कब प्रेम में तब्दील हो गया, मालूम न पड़ा।
“तुम्हारा जामिया(Jamia Milia Islamia University) हमारे मिरांडा(Miranda House College for woman) से क्या मुकाबला करेगा।” 
“देखो! यूँ चिढ़ाया मत करो”
मासूम-से नोकझोंक के विषय कब गम्भीर मोड़ ले लें, क्या मालूम? “देखो लड़का हुआ तो नाम ज़ाकिर(zakir) होगा”
“नाम तो अभिजीत ही होगा, वरना मुझसे मिलने या बात करना भी भूल जाओ” यही सुनते साँस अधर में लटक आई। “यह धर्म भी हमारे बीच पालम विहार के फाटक की तरह है, हरदम हमें दूर करता है, “अच्छा! अब्राम(AbRam) के बारे में तुम्हारा क्या ख्याल है?” 
उसके सवाल की शरारत से चेहरा ख़िल उठा “धत्त! बड़े आए तुम शाहरुख़ खान!”

लघु कथा: बी.ए. के दिन

लघु कथा की श्रृंखला में दूसरा हिस्सा ‘बी.ए. के दिन‘। मीना, एक पढ़ी-लिखी गृहणी की कहानी है, जो हर-रोज़ के घरेलू कोलाहल में अपने सपनों को अपनी बेटी द्वारा रोज़ थोड़ा करीब से देखती है।
मीना सुबह-सुबह अपनी बेटी की चोटी बनाकर, उसे तेज़ी से स्कूल भेजने की दौड़ में जुटी हुई है। अब इस दौड़ को १२(12) वर्ष होने को हैं। 
उसी रफ़्तार से लंच पेक करने से लेकर सबके सामान का ध्यान रखने में सारा दिन निकल जाता है| सहसा तभी आवाज़ सुनाई पड़ती है “मीना मेरी टाई कहाँ गई?” सरपट दौड़ती हुई टाई पहनाकर, बेटी का इंतज़ार करते ऑटो में उसे सवार कराने निकल पड़ी। 
हर रोज़ विदा करने पर हाथ हिलाती हुई वह अपनी बेटी द्वारा अपने सपनों की जीवंत स्मृति अपने दिलों-दिमाग पर हावी पाती। 
दोपहर घर ख़ाली पाती तो बंद अलमारी में पड़ी किताबें उसे खींच लेती। ‘बी.ए. के दिन भी क्या कमाल थे!’….

Friday, 27 May 2016

लघु कथा: आई ऍम ओके

लघु कथा की श्रृंखला में पहले संस्करण का हिस्सा  ‘आई  ऍम ओके!‘ , उस लड़की की कहानी है जो प्यार के मतलब और उसके मायने ढूंढ रही है |
downloadआजकल का प्यार भी कुछ अजीब सा मालूम पड़ता है।  वीरान कोनों और खम्बों से लदकर जो होता है, क्या उसे प्यार समझा जाने लगा है? क्या प्यार की परिभाषा इतनी क्षीण हो गई है?
जिनसे जन्म–जन्म साथ देने की बात की गई थी, उनसे आज आँख मिलाना भी दूभर लगता है। क्या इतना कमज़ोर और दुर्बल है वर्तमान का प्रेम?
जिनके विपक्ष में एक शब्द न सुनते थे, उनकी बात करना भी त्रासदी से कम नहीं। 
एकाएक प्यार में मशगूल हो गए , प्यार में कई तराने पढ़े और नए आयाम हासिल किये, गलती बस यही हुई कि उसी को जीवन का आधार बना बैठे। प्रेम को नहीं उस व्यक्ति को। 
आज अपना अकेलापन भी कानों में ‘हैडफ़ोन’ लगा कर छुपना पड़ रहा है। हर दूसरे व्यक्ति के सवाल पर वह एक नकली मुस्कान देकर कहती ‘आई ऍम ओके’।

Wednesday, 2 March 2016

The New Sun


<<<***Read WordPress: The New Sun***>>>

There I was, strolling alone at night,
sleep deprived, as thoughts wavered the mind

with no human awake, and quietude spread around,
few still welcomed this new guest with friendly barks aloud

In my thoughts, as I moved one end to the other,
my partners followed, as if the child followed the mother

As we matched our steps, I lamented for I'd nothing to offer,
leaving both with no choice but to suffer

Fatigued, as I sat on the side,
one came up, looked as if he knew what I liked

His eyes craved for love, as I caressed his soft tender fur,
Surrendered to me like I his master, and he my son

Contended we both left, satisfying our hunger
with unconditional love that now had won,
and then came the new sun.