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Tuesday, 31 May 2016

लघु कथा: बी.ए. के दिन

लघु कथा की श्रृंखला में दूसरा हिस्सा ‘बी.ए. के दिन‘। मीना, एक पढ़ी-लिखी गृहणी की कहानी है, जो हर-रोज़ के घरेलू कोलाहल में अपने सपनों को अपनी बेटी द्वारा रोज़ थोड़ा करीब से देखती है।
मीना सुबह-सुबह अपनी बेटी की चोटी बनाकर, उसे तेज़ी से स्कूल भेजने की दौड़ में जुटी हुई है। अब इस दौड़ को १२(12) वर्ष होने को हैं। 
उसी रफ़्तार से लंच पेक करने से लेकर सबके सामान का ध्यान रखने में सारा दिन निकल जाता है| सहसा तभी आवाज़ सुनाई पड़ती है “मीना मेरी टाई कहाँ गई?” सरपट दौड़ती हुई टाई पहनाकर, बेटी का इंतज़ार करते ऑटो में उसे सवार कराने निकल पड़ी। 
हर रोज़ विदा करने पर हाथ हिलाती हुई वह अपनी बेटी द्वारा अपने सपनों की जीवंत स्मृति अपने दिलों-दिमाग पर हावी पाती। 
दोपहर घर ख़ाली पाती तो बंद अलमारी में पड़ी किताबें उसे खींच लेती। ‘बी.ए. के दिन भी क्या कमाल थे!’….

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