लघु कथा की श्रृंखला में पहले संस्करण का हिस्सा ‘आई ऍम ओके!‘ , उस लड़की की कहानी है जो प्यार के मतलब और उसके मायने ढूंढ रही है |
आजकल का प्यार भी कुछ अजीब सा मालूम पड़ता है। वीरान कोनों और खम्बों से लदकर जो होता है, क्या उसे प्यार समझा जाने लगा है? क्या प्यार की परिभाषा इतनी क्षीण हो गई है?
जिनसे जन्म–जन्म साथ देने की बात की गई थी, उनसे आज आँख मिलाना भी दूभर लगता है। क्या इतना कमज़ोर और दुर्बल है वर्तमान का प्रेम?
जिनके विपक्ष में एक शब्द न सुनते थे, उनकी बात करना भी त्रासदी से कम नहीं।
एकाएक प्यार में मशगूल हो गए , प्यार में कई तराने पढ़े और नए आयाम हासिल किये, गलती बस यही हुई कि उसी को जीवन का आधार बना बैठे। प्रेम को नहीं उस व्यक्ति को।
आज अपना अकेलापन भी कानों में ‘हैडफ़ोन’ लगा कर छुपना पड़ रहा है। हर दूसरे व्यक्ति के सवाल पर वह एक नकली मुस्कान देकर कहती ‘आई ऍम ओके’।
जिनके विपक्ष में एक शब्द न सुनते थे, उनकी बात करना भी त्रासदी से कम नहीं।
एकाएक प्यार में मशगूल हो गए , प्यार में कई तराने पढ़े और नए आयाम हासिल किये, गलती बस यही हुई कि उसी को जीवन का आधार बना बैठे। प्रेम को नहीं उस व्यक्ति को।
आज अपना अकेलापन भी कानों में ‘हैडफ़ोन’ लगा कर छुपना पड़ रहा है। हर दूसरे व्यक्ति के सवाल पर वह एक नकली मुस्कान देकर कहती ‘आई ऍम ओके’।
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